पंचायती राज जिंदाबाद सुजाता–पंकज और पंचायत राज
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Long live Panchayati Raj Sujata-Pankaj and Panchayati Raj मेरे गांव की सरपंच हैं—सुजाता पंकज राऊत। यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि समर्पण, ईमानदारी और संघर्ष का दूसरा नाम है। पंकज इंजीनियर हैं और सुजाता एमबीए।
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पुणे में सुख-सुविधाओं से भरी जिंदगी जी रहे थे, करीब ढाई लाख रुपये मासिक आय थी, मगर दोनों के मन में कुछ और ही सपना पल रहा था—ग्राम उत्थान और समाज सेवा। इस सपने को साकार करने के लिए वे नागपुर लौटे, क्योंकि वहीं से सावंगी गांव नजदीक था।
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गांव की सेवा की, और जनता ने इनाम दिया—सुजाता हमारी बहू सरपंच बनीं। छोटे-छोटे बच्चों के साथ नागपुर-सावंगी का सफर शुरू हुआ। पंकज की पूरी सैलरी जनसेवा में लगने लगी।
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इतना ईमान कि सचिव से लेकर रोजगार सहायक तक—कोई भ्रष्टाचार करने की हिम्मत न कर सका। लेकिन यही ईमानदारी उनके खिलाफ हथियार बना दी गई।
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जनपद पंचायत तक उनकी सच्चाई की गूंज पहुंची, और शुरू हुआ प्रताड़ना का दौर—काम रोकना, पेशी लगाना, जांच करना… हर हथकंडा अपनाया गया, ताकि इस साफ दिल जोड़ी के कदम रोके जा सकें।
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आज भी हमारे गांव के लोग उन्हें प्यार से याद करते हैं—उनके बनवाए कंप्यूटर शिक्षा केंद्र, लाइब्रेरी, जिम और पक्की सड़कें इस बात के गवाह हैं कि पंचायत राज का असली मतलब क्या होता है।
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यहां तक कि कई नेता भी डरने लगे कि कहीं यह जोड़ी ऊंची उड़ान न भर ले। अगर ये दोनों असफल भी हो जाएं तो शायद उनका नुकसान न हो—क्योंकि पंकज के पास विदेश से भी नौकरी के ऑफर हैं। असली नुकसान होगा—हमारा और पंचायत राज का। संघर्ष अभी जारी है। देखते हैं—जीत होगी साफ दिल की या कूटनीति की।
जय हो पंचायत राज की!
काशीनाथ साहू, ग्रामीण
